India failed in Afghanistan

क्या भारत अफगानिस्तान में विफल हो गया है?

हाल ही में, भारतीय मीडिया में अफगानिस्तान की स्थिति पर कुछ टिप्पणियों ने व्यापक चिंता पैदा की है। इन आलोचकों के अनुसार, अमेरिका की अफगानिस्तान में से सैनिक वापसी न केवल में लोकतंत्र की विफलता है, बल्कि भारत की भी विफलता है। क्योंकि भारत हमेशा अमेरिकी शक्ति की आड़ में अफगानिस्तान और यहां तक ​​कि मध्य एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है, लेकिन अफगान स्थिति के बदलाव से आशा की किरण बुछ गई है।

तो, तथ्य क्या हैं? अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था या भारतीय लाभ की चर्चा करते समय, 39 मिलियन अफगान लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। तालिबान सत्ता के नवनियुक्त कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुताकी ने 14 सितंबर को काबुल में कहा कि तालिबान सरकार अफगानों की आजीविका की जरूरतों को सुनिश्चित करने, घरेलू शांति और स्थिरता को जल्द से जल्द हासिल करने और रोजगार के मौके पैदा करने  के लिए हर संभव प्रयास करेगी। उन्हों ने यह वादा भी किया कि कोई भी आदमी इस देश से स्वतंत्र रूप से छोड़ सकेगा। मुताकी ने कहा कि नई अफगान सरकार समानता और आपसी सम्मान के आधार पर विदेशी संबंध स्थापित करने की उम्मीद करती है। आशा है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अफगानिस्तान की सहायता करना जारी रखेगा, लेकिन विदेशी बलों को अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। उधर तालिबान के नवनियुक्त हेलमंद प्रांत गवर्नर ने भी कहा कि किसी भी विदेशी का अफगानिस्तान में "बंदूक लिए नहीं, पर पैसे के साथ" लौटने के लिए स्वागत है।  

अफगान तालिबान के हालिया बयानों और कार्रवाइयों को देखते हुए, यह वास्तव में एक सामान्य देश की सरकार बनने, व्यापक और समावेशी नीति अपनाने और साथ ही शांतिपूर्वक अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एकीकृत होने की उम्मीद करता है। लेकिन आधार यह है कि सब कुछ अफगानों के हितों पर आधारित होना चाहिए। और पश्चिमी ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों को मौका मिलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। समस्या की जड़ यहीं है: यदि आप पश्चिमी देशों के दृष्टिकोण से बात देखते हैं, तो अफगानिस्तान में सब कुछ विफल हो गये हैं, लेकिन यदि अफगानों के दृष्टिकोण से देखें, तो तथ्य विपरित है। दुनिया में अनेक इस्लामी देश हैं, और वे सभी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ शांतिपूर्ण रूप से मिलकर रह सकते हैं, तो अफगानिस्तान क्यों नहीं?  

हम देख सकते हैं कि अफगान मुद्दे का फोकस हितों पर नहीं, बल्कि सिद्धांतों पर है। अफगान लोग पश्चिमी राजनीतिक मॉडल को अपनाना नहीं चाहते, लेकिन जब तक अफगान राष्ट्र का सम्मान किया जाता है, तो वह किसी भी देश के साथ सहयोग करने को तैयार है। साथ ही यह बात भी स्पष्ट है कि किसी भी अफगान सरकार को लोगों की आजीविका को तब तक बनाए रखना चाहिए जब तक वह अस्तित्व में रहना चाहती है। उधर अमेरिका के 20 साल के सैन्य कब्जे ने अफगानिस्तान में शांति और समृद्धि नहीं लाई है। वर्तमान में, अफगान अर्थव्यवस्था पतन के कगार पर है, सरकारी कर्मचारी मजदूरी का भुगतान नहीं कर सकते हैं, और कई रेस्तरां और दुकान भी बंद हो गये हैं। अफगानिस्तान को तत्काल अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और मानवीय सहायता की आवश्यकता है।
  
यह नहीं कहा जा सकता कि अफगानिस्तान के हालात में जो नाटकीय बदलाव आया है, वह भारत की विफलता है। पिछले 20 वर्षों में अमेरिका के अलावा, भारत वह देश है जिसने अफगानिस्तान में सबसे अधिक निवेश किया है। और अमेरिका के सैन्य निवेश के विपरीत, अफगानिस्तान में भारत का अधिकांश निवेश लोगों की आजीविका परियोजनाओं से संबंधित है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक, तथा जलविद्युत बांधों से लेकर राजमार्गों तक, अफगानिस्तान में भारत का कुल निवेश लगभग चार अरब अमेरिकी डॉलर है। भारत द्वारा निवेश की गई परियोजनाएं सीधे अफगान लोगों को लाभान्वित करती हैं। उदाहरण के लिए, भारत द्वारा निर्मित परियोजनाएं जैसे सलमा हाइड्रोपावर स्टेशन और अफगान संसद भवन की अफगानों लोगों में भुरि भुरि प्रशंसा की गयी है, और तालिबान क्यों लोकप्रिय परियोजनाओं का विरोध करेगा?इसलिए, यदि अफगान लोगों के पक्ष में खड़ा हो, और अफगानिस्तान के आर्थिक निर्माण में ईमानदारी से योगदान देता हो, तो भारत को अपने हितों के प्रभावित होने की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

सही रवैया यह होना चाहिए: एक करीबी पड़ोसी के रूप में हमें हमेशा अफगान लोगों के हितों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, चाहे भले ही कोई भी अफगान सत्ता पर आए। दूसरी ओर हमें इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिये कि अफगानिस्तान में चाहे कौन सत्ता में है, तो उसे पड़ोसी देशों और सारे क्षेत्रों के मौलिक हितों की रक्षा करनी पड़ेगी। खासकर उसे आतंकवाद के साथ सभी संबंधों को बन्द करना पड़ेगा, और शांतिपूर्ण शक्ति बनना पड़ेगा। इस तरह, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस सरकार का स्वागत और समर्थन कर सकेगा। वर्तमान में, चीन और भारत ने अफगानिस्तान में कई आर्थिक परियोजनाओं का निर्माण किया है, जो अफगानिस्तान की आजीविका और रोजगार की गारंटी दे रही हैं। अफ़ग़ानिस्तान को शांति और स्थिरता की राह पर तेज़ी से चलने में मदद करने से सारे क्षेत्र के हितों के लिए अनुकूल है। पड़ोसी देशों को भी अफगानिस्तान की शांति और स्थिरता से दीर्घकालिक लाभ मिलेगा, और कोई हारने वाला पक्ष नहीं होगा।
(साभार - चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)




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