Prof Manjit Singh Kang

खेती के विविधीकरण में है किसानों का भला: प्रो. मनजीत सिंह कंग

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना के पूर्व कुलपति और अमरीका में कैनसास स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर डॉ. मनजीत सिंह कंग मानते हैं कि फसलों में विविधता बढ़ाकर कृषि संकट का समाधान और टिकाऊ खेती की जा सकती है। वह कहते हैं कि देश का पेट भरने वाले पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को सिर्फ गेहूं-चावल के फसली चक्र से निकालकर दलहन-तिलहन उगाने की ओर ले जाने के प्रयास करने होंगे। सरकार को इन फसलों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की व्यवस्था करनी चाहिए। नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बारे में उन्होंने कहा कि सरकार और किसानों के बीच बंद बातचीत दोबारा शुरू होनी चाहिए। बातचीत पर जो डैडलॉक बना हुआ है, वह टूटना चाहिए। यह इकॉनमी को लेकर भी देश का नुकसान है। 

भारतीय कृषि के संकट पर लगातार लिख रहे प्रो. कंग ने कहा, सबसे जरूरी बात तो यह है कि आज किसानों को पैदावार में विविधता लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक समय भारत में अनाज का भारी संकट था। किसानों और कृषि विज्ञानियों की मेहनत से देश धीरे-धीरे अनाज में आत्मनिर्भर हो गया। आज देश में सरप्लस अनाज है, फिर भी किसान संकट में हैं। यह चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के दौरान एक गलती हुई थी। तब मुख्य अनाज गेहूं-चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए एमएसपी घोषित की गई थी। इससे किसान इन्हीं दो फसलों को उगाने लगे। पंजाब में पहले पीली मक्की और दालें भी खूब होती थीं। इनकी खरीद एमएसपी पर नहीं होती थी। इसलिए धीरे-धीरे किसानों ने इन्हें उगाना बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि मक्की के आज 200 से ज्यादा औद्योगिक उपयोग हैं। इसे बढ़ावा देने के लिए सरकार को प्रोसेसिंग इकाइयां लगानी चाहिए।

प्रो. कंग के अनुसार सिर्फ गेहूं-चावल उगाने से पंजाब की मिट्टी पर बहुत दबाव बढ़ गया। मिट्टी को भी आराम मिलना चाहिए। चालीस साल से यहां साल में किसी भी समय जमीन खाली नहीं रहती। उत्पादकता बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल होने से पंजाब की मिट्टी आज रेगिस्तान जैसी बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि इससे निकलने का एक ही समाधान है कि पंजाब में धान की खेती का रकबा घटाया जाए। इसमें दालें बोई जाएं। दालों की फसलों से खेत में नाइट्रोजन अपने आप बढ़ता है। इससे मिट्टी मजबूत होगी। चावल की तुलना में दालें उगाने में कम पानी लगता है। पंजाब का पानी और नीचे जाने से रुकेगा।

उन्होंने जोर दिया कि पंजाब ही नहीं पूरी दुनिया में टिकाऊ खेती पर जोर दिया जा रहा है। टिकाऊ खेती यानी जिसमें अनाज तो भरपूर हो मगर संसाधनों को नुक्सान न हो। ऐसा न हो कि जरूरी प्राकृतिक संसाधन जैसे मिट्टी, पानी अगली पीढ़ियों के लिए बचे ही नहीं। आज यही सबसे बड़ा संकट है। इस बारे में भी आज सबको सोचना है। आज पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान अगर सिर्फ गेहूं-चावल उगा रहे हैं तो इसके लिए हरित क्रांति के दौरान अपनाई गई नीतियां और उनके अब तक जारी रहने का दोष है। बेहतर यही है कि मक्की और तिलह-दलहन उपजाने को बढ़ावा देने के उपायों के लिए किसान नेता सरकार से बातचीत करें।

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