Essential Commodities (Amendment) Act

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 सिर्फ तीन धाराओं वाला कानून

भाग 4ः आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 सिर्फ तीन धाराओं वाला कानून है। इसकी धारा 2 का निचोड़ इस प्रकार है:

आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कृषि एवं खाद्य पदार्थों के लिए किया गया है, जिनमें अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य तेल व तिलहन शामिल है। संशोधन में यह उल्लेख किया गया है कि उक्त वस्तुओं पर नियंत्रण केंद्र सरकार केवल असाधारण परिस्थितियों में कर सकती है। जैसे, युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान। संशोधन के तहत स्टॉक सीमा थोपने या इस पर नियंत्रण करने के लिए एक पारदर्शी मापदंड की व्यवस्था की गई है। वह इस प्रकार है कि बागवानी उत्पादों के फुटकर भाव में 100% बढ़ोतरी हो जाए या जल्दी खराब न होने वाले (नॉन-पेरिशेबल) कृषि खाद्य पदार्थों के फुटकर भाव में 50% बढ़ोतरी हो और इस मूल्यवृद्धि का आधार ठीक 12 माह पहले के भाव या पिछले पांच साल के औसत फुटकर भाव  में से जो भाव कम हो, वह होगा। यह संशोधन सरकार की कार्रवाई में एक पूर्व संभावना को शामिल करता है। यानी आवश्यक वस्तु अधिनियम की धाराओं को मूल्य वृद्धि होने के आधार पर लागू किया जाएगा, किसी कोरी धारणा या मनमर्जी के आधार पर नहीं।

नीति आयोग के अनुसार यह कानून किसी भी प्रकार मूल्य नियंत्रण में हस्तक्षेप करने के सरकार के अधिकार को घटाता नहीं है। यह इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि सरकार ने 23 अक्टूबर 2020 को प्याज पर भंडारण सीमा लागू कर दी थी, अर्थात आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के बाद। इस प्रकार इस कानून में किए गए संशोधन की इस आधार पर आलोचना करना कि यह स्टॉकिस्टों और बाजार का फायदा उठाने वालों को खुले हाथ से खेलने का मौका देता है, बिल्कुल निराधार है। विगत समय में भी खाद्य पदार्थों के ऊंचे भावों को नीचे लाने के लिए उपभोक्ताओं के हित में आवश्यक वस्तु अधिनियम को लागू किया गया है। बेशक इसका विपरीत प्रभाव किसानों को मिलने वाले भावों पर भी पड़ता है। किसानों के मतलब की वस्तुओं जैसे खाद और बीजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के संशोधन में छेड़ा नहीं गया है। संशोधन उनके पक्ष में है, फिर भी आंदोलनकारी किसान आश्चर्यजनक रूप से इसका विरोध कर रहे हैं। इस संशोधन से वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउसेज और आवागमन की सुविधाओं में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा जिससे खाद्य पदार्थों की क्षति, कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव और अचानक आपूर्ति बढ़ने से गिरती कीमतें रोकने मेें भी मदद मिलेगी।


किसानों का नजरिया:-
किसानों का मानना है कि यह कानून मुख्य रूप से बड़े व्यापारिक घरानों को लाभ पहुंचाएगा। असीमित स्टॉक सीमा होने के कारण वे अपनी शर्तों पर खाद्य पदार्थ खरीदेंगे और उपभोक्ताओं को ऊंचे दाम पर बेचकर अनुचित मुनाफा कमाएंगे। यह कानून जल्दी खराब होनी वस्तुओं (पेरिशेबल) पर 100 प्रतिशत और नॉन-पेरिशेबल पर 50 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने की छूट देता है अगर कीमतों की तुलना 12 माह से ठीक पहले या पिछले पांच साल के औसत, जो भी कम हो, से की जाए। उदाहरण के लिए अगर कोई कॉरपोरेट 10 रुपए/किलोग्राम पर प्याज खरीदता है और इसका पिछले 12 माह से ठीक पहले का फुटकर मूल्य 30 रुपए/किलोग्राम है और पिछले पांच साल का औसत मूल्य 25 रुपए/किलोग्राम है तो कॉरपोरेट को 10 रुपए/किलोग्राम खरीदे प्याज को 50 रुपए/किलोग्राम (इन दोनों में से कम कीमत 25 रुपए/किलोग्राम का 100 प्रतिशत) पर बेचने की छूट मिल गई है। इस तरह 10 रुपए/किलोग्राम खरीदने और 50 रुपए/किलोग्राम बेचने की इजाजत है। इसमें कहां किसान का फायदा है और कहां उपभोक्ता का फायदा है?


सरकार का दावा:-
सरकार इसे किसानों और उपभोक्ताओं के पक्ष में बताती है। उसके अनुसार नए प्रावधानों केनुसार निजी क्षेत्र को स्टॉक रखने की खुली छूट मिलने से वह वेयरहाउस और अन्य ढांचागत सुविधाओं में निवेश बढ़ाएगा। इससे कृषि उपज बेकार होने से बचेगी। अभी 40 फीसदी तक कृषि उपज बेकार चली जाती है। यह क्षति रुकेगी तो आपूर्ति बढ़ेगी और उपभोक्ताओं के लिए कृषि उपज सस्ती हो जाएगी। 

इससे जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न इस प्रकार हैं:
1.इस कवायद से किसानों को क्या वित्तीय लाभ होंगे?
2.इस बात की क्या गारंटी है कि कंज्यूमर को कृषि उत्पाद कम कीमत पर मिलेंगे?
3.अगर निजी क्षेत्र को अधिक मूल्य लेने की छूट मिलेगी तो क्या वे अपना मुनाफा घटा देंगे?
कल का विषय : किसानों की लंबी समय से चल रही समस्याओं को लेकर उनके सवालों के जवाब और संभावित समाधान

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