Chinese political systems

क्या चीनी राजनीतिक तंत्र अधिक प्रशंसनीय हैं?

भारत में अक्सर यह सुनता है कि चीन का तेज विकास इस तथ्य में निहित है कि चीन की एक मजबूत सत्ताधारी पार्टी है, और चीन में भिन्न भिन्न दलों के बीच अंतहीन झगड़ाएं और आपसी हमले नहीं हैं। इसलिए चीन की सरकार योजना बनाती है, और वह निश्चित तौर पर उस योजना को लागू कर सकेगी। ऐसी व्यवस्था भारतीयों के लिए ईर्ष्या करने योग्य है।

चीन और भारत दोनों प्राचीन सभ्यताएं हैं, पर दोनों देशों का अलग-अलग राजनीतिक विकल्प है। चीन की एक दलीय व्यवस्था है, जबकि भारत में बहुदलीय व्यवस्था चलती है। इन दोनों में से कौन सा सिस्टम बेहतर है ? इस सवाल पर बहस करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। जैसे कोई व्यक्ति किस तरह के कपड़े और जूते पहनता है, उसे आरामदायक है या नहीं, इसपर बहस करने की क्या जरूरत है? हालांकि, दुनिया में हमेशा कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों के रहन-सहन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। वे हमेशा चीन की राजनीतिक व्यवस्था के बारे में बकवास करना पसंद करते हैं।  

मौजूदा महामारी की वजह से लोगों ने स्पष्ट जानकारियां प्राप्त की हैं। महामारी की रोकथाम में चीन सरकार ने हमेशा मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता दे दी है, और महामारी को नियंत्रित करने के लिए कई शक्तिशाली कदम उठाये हैं। कई पहलुओं में चीन की राजनीतिक व्यवस्था की श्रेष्ठता साबित है। अब चीन ने महामारी के प्रसार को अच्छी तरह से नियंत्रित कर लिया है और चीन, दुनिया के कई देशों का टीके और महामारी विरोधी सामग्री के जरिये समर्थन कर रहा है। उधर अमेरिका, जिसे दुनिया के सबसे विकसित देश के रूप में जाना जाता है, महामारी के खिलाफ लड़ाइयों में बदतर और बदतर होता जा रहा है। इसकी संक्रमित मामलों की संख्या और मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है। समस्या इसमें है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के तहत, सरकार राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए नागरिकों को अपने व्यक्तिगत हितों को छोड़ने मजबूर करने में असमर्थ है। 

मानव अधिकारों के बारे में जो बहस है, वह राजनीतिक व्यवस्था के बारे में विवाद ही है। चीन में मानवाधिकार का मुद्दा, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली प्रणाली के अनुरूप है। कुछ लोगों की नज़र में, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी सत्तावादी, अलोकतांत्रिक है और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला राजनीतिक दल है। लेकिन जो चीन की यह आलोचना कर रहे हैं, वे आम तौर पर चीन की वास्तविक स्थिति को बिल्कुल अज्ञात वाले हैं। एक बार जब वे व्यक्तिगत रूप से चीन की जांच करने गये, तो वे अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। उदाहरण के लिए, अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ऐश रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए 13 वर्षों के अनुवर्ती सर्वेक्षणों के मुताबिक, "चीनी लोगों में 90 प्रतिशत भाग केंद्र सरकार के प्रति संतुष्ट हैं।" 

यदि चीन की राजनीतिक व्यवस्था अच्छी नहीं है और लोग सरकार से असंतुष्ट हैं, तो यह शोध निष्कर्ष कैसे निकला? पश्चिमी दर्शन के अनुसार, बहुमतों को अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है। यह सिद्धांत चीन में समान है। बहुमत के समर्थन के बिना कोई भी सरकार शासन नहीं कर सकती। चीन में जन प्रतिनिधि सभा की प्रणाली है। आम आदमी  प्रतिनिधि को निर्वाचित करते हैं। और ये प्रतिनिधि सभी स्तरों पर सरकारों और नेताओं का चुनाव करते हैं। अगर ऐसी व्यवस्था अलोकतांत्रिक और निरंकुश है, तो ज्यादातर चीनी लोग ऐसी व्यवस्था का समर्थन क्यों करते हैं?

वास्तव में चीन और भारत के बीच जो अंतर है वह यही है कि चीन में मजबूत सत्तारूढ़ दल यानी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी है, जिससे चीन में सभी विकास और प्रगतियों की गारंटी है। चीन और भारत ने लगभग एक ही समय में स्वतंत्रता हासिल की थी। उस समय, चीन की आर्थिक स्थिति भारत की तुलना में कहीं अधिक खराब थी। लेकिन 70 सालों के बाद अब चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, चीन के मानवीय विकास के ज्यादातर सूचकांक भारत से ऊपर हैं। यहां भारत की राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन कई भारतीय विद्वानों का मानना है कि भारत की बहुत से कमजोरियां बहुदलीय प्रणाली के आंतरिक संघर्षों का परीणाम है। और मानव संसाधनों को व्यवस्थित करने में चीन को अधिक कुशल साबित है। 

कई देशों में एक समान मुहावरा है: "जूते आरामदेह है या नहीं,  जूते पहनने वाले लोग खुद इसे जानते हैं।" किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था अच्छी है या नहीं, इसका मूल्यांकन उसी देश के लोगों को करना चाहिए। खासकर जब दुनिया को अभूतपूर्व परिवर्तन का सामना करना है, तो राजनीतिक व्यवस्था के बारे में बहस करना अर्थहीन है। विचारधारा के मुताबिक छोटा गुट बनाना संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के अनुरूप नहीं है, और वह विश्व के हितो में भी नहीं है।
( साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग )


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