श्री शीतल जी (Editor In Chief)


प्रिय पाठको, आज आप को यह पत्र लिखते हुए मैं रोमांचित हूं। मैं खुले मन से यह स्वीकार करना चाहता हूं कि ठीक तीन साल पहले (जनवरी 2012) हमने ‘दैनिक सवेरा’ का शुभारंभ किया था तब सोचा भी नहीं था कि मात्र तीन बरस की उम्र में ही आप इसे सिर-आंखों पर बैठा कर इतना शक्तिशाली बना देंगे कि यह उन्हें भी चुनौती देने में सक्षम हो जाएगा जो 50 बरसों से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता पर अपना एकाधिकार बनाए बैठे थे।

मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि केवल तीन ही वर्षों में लोकप्रिय ‘दैनिक सवेरा’ की प्रसार संख्या 3 लाख हो जाएगी और 30 लाख पाठकों का चहेता बन जाएगा आप का ‘दैनिक सवेरा’। मेरा तो एकमात्र मिशन था लोगों को जागरूक करना। मैं बताना चाहता था कि बिना अश्लील चित्र प्रकाशित किए भी पत्रकारिता की जा सकती है। मुङो यह आगाह करना था कि केवल धन के लालच में किसी के खिलाफ समाचार प्रकाशित कर देना पाप है। मेरा मिशन था कि मैं पाठकों को बता सकूं कि पत्रकारिता व्यापार नहीं बल्किपवित्र रास्ता है- सत्य का और सेवा का। मुङो यह संदेश देना था कि अखबार वाले भी आम आदमी की तरह ही होते हैं तथा उन्हें किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं है। मैं यह भी संदेश पहुंचाना चाहता था कि यैलो जर्नलिज्म और ब्लैकमेलिंग के बिना भी समाचार पत्र निकाला जा सकता है।


प्रिय पाठको, ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता का पूरा जगत ही भ्रष्ट हो गया है लेकिन यह सच है कि पंजाब में हिंदी पत्रकारिता के वो स्तंभ ढह गए जो मिशन लेकर चले थे। महाशय कृष्ण (वीर प्रताप) तथा महाशय खुशहाल चंद (हिन्दी मिलाप) एक मिशन लेकर चले थे। उनके सुपुत्रों श्री वीरेन्द्र तथा श्री यश को उनके मिशन को आगे बढ़ाते हुए इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि कब कुछ व्यापारी किस्म के लोग पत्रकारिता में घुसपैठ कर गए और पाठकों को मसालेदार खबरों और अश्लील चित्रों के साथ आकर्षित करना शुरू कर दिया। जो वास्तव में मिशन लेकर निकले थे, वे मिशन में ही डूबे रहे और जिन्हें ब्लैकमेलिंग और व्यापार करना था, वे चतुराई के साथ आगे निकल गए। धन के बल पर हमने उन्हें पवित्र पत्रकारिता का गला घोंटते हुए देखा।
दिल के कोने से आवाज आती थी कि कुछ करना होगा। अच्छे पत्रकारों से सहयोग मांगा, एक पूरी सेना मिल गई अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए। लेकिन सबसे पहले यह भी मन बना लिया कि टैक्नोलॉजी के अभाव से पीछे नहीं रहना है। लेटैस्ट मशीनरी का प्रबंध किया और उत्तम संपादकों तथा पत्रकारों का साथ लिया और इस विश्वास के साथ निकल पड़े अपने मिशन पर। कुछ ने डराया भी। कहते थे, बहुत मुश्किलें आएंगी लेकिन मां त्रिपुरमालिनी का आशीर्वाद ले कर पाठकों के सहयोग की उम्मीद के साथ हम उतर पड़े आप के दरबार में। फिर कह रहा हूं, आप इतना प्यार देंगे, ऐसा कभी भी नहीं सोचा था। मैं अद्भुत अनुभव करते हुए कह रहा हूं कि इतनी जल्दी किसी भी समाचार पत्र को इतना
लोक प्रिय होते किसी ने कभी भी नहीं देखा। जो प्यार, सहयोग, समर्थन और साहस आपने दिया, वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। एक परीक्षा की घड़ी भी आई जब जम्मू-कश्मीर त्रसदी आई। उस वक्त आपने अभूतपूर्व सहयोग देकर मेरी छोटी-सी अपील पर 2 करोड़ रुपए से ज्यादा भेज दिए।
यह सच है कि इस अपार सफलता के पीछे मेरे पूरे संपादक मंडल, पत्रकार साथियों, मेरे परिवार तथा अन्य सहयोगियों की कड़ी मेहनत भी रही लेकिन सब से बड़ी ताकत मुङो पाठकों से ही मिली है। शब्दों से शायद मैं आप का आभार व्यक्त न कर सकूं लेकिन आप मेरी भावनाओं को अवश्य ही समझ रहे होंगे। मुङो विश्वास है कि आपका स्नेह भविष्य में भी मुङो इसी प्रकार मिलता रहेगा। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मैं भरसक प्रयास करूंगा कि मैं जीवन भर ऐसा कुछ न करूं जिससे आप के विश्वास को आघात पहुंचे। मैं यहां यह भी कहना चाहता हूं कि जब भी आप कोई शिकायत अथवा सुझाव भेजते हैं, तो मुङो अच्छा भी लगता है और उस से हमें बल भी मिलता है। इसे बंद मत कीजिएगा।
जब यह सफर तीन बरस पहले शुरू किया था तो बहुत चुनौतियां थीं सामने, मैं बिल्कुल अकेला था लेकिन पता ही नहीं चला कि पाठकों की मोहब्बत ने कब कितना बड़ा काफिला खड़ा कर दिया। आपके प्यार और सहयोग से दैनिक सवेरा जम्मू भी पहुंच गया है और चंद महीनों में ही लोकप्रिय हो गया है। यूं लगता कि सारा जमाना मेरे मिशन की सफलता के लिए मेरे साथ खड़ा हो गया। जी में आता है कि मैं अपने पाठकों के सम्मान में कहूं, ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और काफिला बनता गया।’
धन्यवाद, शुभकामनाएं।
आपका शीतल विज।